शिक्षा मंत्रालय ने शास्त्रीय असमिया, शास्त्रीय बंगाली, शास्त्रीय मराठी, शास्त्रीय पाली और शास्त्रीय प्राकृत के अध्ययन के लिए पांच उत्कृष्टता केंद्रों (Centres of Excellence) को मंजूरी दी है। इस पहल का उद्देश्य भारत की भाषाई और साहित्यिक विरासत से जुड़े शोध, संरक्षण, डिजिटलीकरण और व्यापक अध्ययन को बढ़ावा देना है।
पांच राज्यों में स्थापित होंगे उत्कृष्टता केंद्र
इन उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना निम्नलिखित संस्थानों में की जाएगी:
– शास्त्रीय असमिया — तेजपुर विश्वविद्यालय, असम
– शास्त्रीय बंगाली — विश्व भारती विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल
– शास्त्रीय मराठी — डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे, महाराष्ट्र
– शास्त्रीय पाली — सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ ओडिशा, कोरापुट, ओडिशा
– शास्त्रीय प्राकृत — सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात, गुजरात
ये केंद्र विश्वविद्यालयों के भीतर काम करेंगे और वहां उपलब्ध फैकल्टी, अकादमिक संसाधनों, शोध कार्यक्रमों और पुस्तकालयों का उपयोग करेंगे। इनका मुख्य फोकस शोध और अकादमिक कार्य को बढ़ावा देने, भाषाई एवं साहित्यिक सामग्री के संरक्षण व डिजिटल संग्रहण तथा इन भाषाओं से जुड़े ज्ञान को अधिक लोगों तक पहुंचाने पर रहेगा।
शास्त्रीय भाषाएं और उनका महत्व
भारत में वर्तमान में 11 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। इनमें तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया को 2004 से 2014 के बीच मान्यता मिली थी, जबकि मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को अक्टूबर 2024 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया।
शास्त्रीय भाषा का दर्जा पाने के लिए प्रमुख मानदंडों में **1,500 से 2,000 वर्षों का पुराना इतिहास या प्राचीन ग्रंथ**, महत्वपूर्ण प्राचीन साहित्य, ज्ञान संबंधी मूल ग्रंथ तथा अभिलेखीय प्रमाण शामिल हैं। साथ ही, भाषा और उसके साहित्य का आधुनिक रूपों से अलग या बाद की भाषाई परंपराओं से विशिष्ट संबंध होना भी एक आधार है।
पांच नए उत्कृष्टता केंद्रों से इन भाषाओं में शोध, दस्तावेजीकरण और संरक्षण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जिससे भारत की समृद्ध भाषाई और साहित्यिक विरासत को आगे संरक्षित किया जा सकेगा।
