झारखंड के पारंपरिक मांदर, जो राज्य की आदिवासी और लोक संस्कृति से गहराई से जुड़ा एक वाद्य यंत्र है, को Geographical Indication (GI) टैग मिला है। यह मान्यता चेन्नई स्थित Geographical Indications Registry द्वारा दी गई है।
GI मान्यता मांदर की पारंपरिक कारीगरी, स्थानीय लाल मिट्टी के उपयोग और इसकी विशिष्ट ध्वनि को पहचान देती है। ढोल और ढोलक जैसे वाद्य यंत्रों से अलग, मांदर का एक हिस्सा पूरी तरह मिट्टी से बनाया जाता है, जो इसके अनोखे डिजाइन और आवाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मांदर झारखंड में लोक प्रस्तुतियों, सामुदायिक आयोजनों और उत्सवों से जुड़ा रहा है और राज्य की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
GI दर्जा पारंपरिक मांदर कारीगरों को कानूनी पहचान और विशिष्टता प्रदान करता है। इससे इस पारंपरिक वाद्य यंत्र और झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक बाजारों में बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।
भारत में GI टैग
Geographical Indication (GI) टैग ऐसे उत्पादों को दिया जाता है जिनकी विशिष्ट गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषताएं किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं। यह उत्पाद की पहचान को कानूनी सुरक्षा देता है और उसके नाम के अनधिकृत इस्तेमाल को रोकने में मदद करता है।
भारत में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 15 सितंबर 2003 को लागू हुआ, जिसके तहत किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े उत्पादों के GI पंजीकरण और संरक्षण के लिए कानूनी व्यवस्था बनाई गई।
दार्जिलिंग चाय भारत में पंजीकृत GI टैग पाने वाला पहला उत्पाद था। इसका GI प्रमाणपत्र अक्टूबर 2004 में जारी किया गया था। GI मान्यता क्षेत्रीय उत्पादों की पहचान और प्रामाणिकता को सुरक्षित रखने के साथ पारंपरिक कारीगरों और उत्पादकों को पहचान दिलाने में मदद करती है।
